बिहार की पारंपरिक पेंटिंग: मधुबनी और मंजूषा कल
बिहार की पारंपरिक पेंटिंग: मधुबनी और मंजूषा कला
भारत विविधताओं से भरा एक अद्वितीय देश है और हर राज्य की अपनी एक अनोखी सांस्कृतिक पहचान है। बिहार, जो प्राचीन मिथिला नगरी का हिस्सा रहा है, अपने गौरवशाली इतिहास, परंपराओं, और कलाओं के लिए जाना जाता है। यहाँ की पारंपरिक चित्रकला – मधुबनी और मंजूषा – न केवल राज्य की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पहचान बना चुकी हैं।
उत्पत्ति और इतिहास
मधुबनी पेंटिंग को मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है। इसका उद्गम बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुआ था, जो वर्तमान में मधुबनी ज़िले में स्थित है। माना जाता है कि इस चित्रकला की शुरुआत राजा जनक के समय हुई थी, जब उन्होंने अपनी पुत्री सीता के विवाह के अवसर पर पूरे नगर को सजाने का आदेश दिया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
शैली और विशेषताएँ
मधुबनी चित्रकला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक रंगों और घरेलू सामग्रियों से बनाई जाती है – जैसे हल्दी, सिंदूर, चावल का पेस्ट, नीला (नील पौधे से), काजल आदि। चित्रों में ज्यादातर प्रकृति, देवी-देवताओं, विवाह, त्योहार, पशु-पक्षी, और मानव आकृतियों का चित्रण होता है।
भरनी शैली
इसमें देवी-देवताओं को रंगीन रूप में दर्शाया जाता है। यह सबसे लोकप्रिय शैली है जो मुख्य रूप से धार्मिक विषयों पर केंद्रित होती है।
कचनी शैली
इसमें केवल रेखाएँ होती हैं और रंग का उपयोग कम होता है। यह शैली अपनी सादगी और सूक्ष्म विवरणों के लिए जानी जाती है।
तन्रिक शैली
धार्मिक प्रतीकों और तांत्रिक रूपों का चित्रण होता है। इस शैली में आध्यात्मिक और तांत्रिक प्रतीकों का प्रयोग होता है।
गोधना शैली
यह गोदना (टैटू) शैली पर आधारित होती है। इसमें ज्यामितीय पैटर्न और डिजाइन प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
कोहबर शैली
विवाह और प्रेम को चित्रित करने वाली शैली। यह शादी के कमरों की सजावट के लिए विशेष रूप से प्रयोग की जाती है।
आधुनिक पहचान और वैश्विक प्रभाव
मधुबनी पेंटिंग को भारत सरकार ने भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्रदान किया है। आज यह न केवल दीवारों, बल्कि साड़ियों, कपड़ों, बैग्स, स्टेशनरी, और होम डेकोर प्रोडक्ट्स पर भी देखी जाती है। कई कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी सम्मान मिला है – जैसे सीता देवी (पद्मश्री पुरस्कार विजेता), महासुंदरी देवी (पद्मश्री पुरस्कार विजेता), बाऊ देवी (राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता) आदि।
परिचय और पृष्ठभूमि
मंजूषा पेंटिंग बिहार के भागलपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों की पारंपरिक कला है। यह चित्रकला बिहुला-बिषहरी कथा पर आधारित है, जो एक लोकगाथा है और सावन महीने में विशेष रूप से मनाई जाती है। 'मंजूषा' शब्द का अर्थ होता है – बाँस की बनी हुई पेटी, जिस पर यह चित्र बनाये जाते थे।
शैली और विशेषताएँ
मंजूषा पेंटिंग में विशिष्ट रूप से लाइनों की सीमाएं होती हैं जो हरे, गुलाबी और पीले रंग में खींची जाती हैं। चित्रों में सर्प देवी (बिषहरी), बिहुला, छाया, बलराम और अन्य पात्रों का चित्रण होता है। इसमें धार्मिक, सामाजिक और पौराणिक कथाओं का समावेश होता है।
इस चित्रकला की सबसे अनोखी बात यह है कि इसमें चित्र और कहानी एक साथ चलते हैं। हर चित्र के पीछे एक गहरी कहानी छिपी होती है जो नारी शक्ति, धैर्य, आस्था, और प्रकृति से संबंध को दर्शाती है।
बिहुला-बिषहरी की लोककथा
मंजूषा कला की आत्मा है बिहुला-बिषहरी की कथा। यह कहानी बिहुला नामक एक वफादार पत्नी की है जो अपने पति लखिन्दर को सर्पदंश से बचाने के लिए सर्पदेवी बिषहरी से मिलती है। यह कथा स्त्री साहस, पत्नी धर्म और प्रेम की अमर गाथा है जिसे पीढ़ियों से मंजूषा कला के माध्यम से दर्शाया जाता है।
विलुप्ति की कगार से पुनर्जीवन
एक समय ऐसा था जब मंजूषा कला लुप्तप्राय स्थिति में पहुँच चुकी थी, लेकिन आज इसके पुनर्जीवन का श्रेय डॉ. शैलेंद्र कुमार और मंजूषा कलाकारों को जाता है। अब यह कला भी GI Tag प्राप्त करने की दिशा में है और सरकारी सहायता से इसका प्रचार-प्रसार हो रहा है। भागलपुर में मंजूषा कला के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए विशेष केंद्र स्थापित किए गए हैं।
[यहाँ मंजूषा कला के पुनर्जीवन से संबंधित छवि जोड़ें - उदाहरण: मंजूषा कलाकार कार्यरत]
दोनों कलाओं का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
महिला सशक्तिकरण का प्रतीक
मधुबनी और मंजूषा दोनों ही कलाएं मुख्यतः ग्रामीण महिलाओं द्वारा की जाती हैं। यह न केवल उनके रचनात्मक कौशल को उजागर करती हैं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर भी एक कदम हैं। आज कई महिलाएँ इन कलाओं के माध्यम से स्वरोजगार कर रही हैं। बिहार सरकार द्वारा इन कलाकारों को प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने की विशेष योजनाएँ चलाई जा रही हैं।
सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण प्रेम
इन कलाओं में जिस प्रकार पेड़-पौधों, जल स्रोतों, पशु-पक्षियों और प्राकृतिक तत्वों का चित्रण होता है, वह समाज को पर्यावरण के प्रति जागरूक करता है। यह चित्रकला केवल रंग और आकृतियाँ नहीं है, यह संस्कृति का दर्पण है। दोनों कलाओं में प्रयुक्त प्राकृतिक रंग पर्यावरण अनुकूल होते हैं और पारंपरिक ज्ञान की अभिव्यक्ति हैं।
वैश्विक पहचान और आर्थिक महत्व
मधुबनी और मंजूषा कला ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बनाई है। विदेशी पर्यटक इन कलाकृतियों को खरीदने में विशेष रुचि दिखाते हैं। कला निर्यात के माध्यम से राज्य को विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। कई अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों में इन कलाओं को प्रदर्शित किया गया है।
उदाहरण: मधुबनी कलाकार सामूहिक रूप से
निष्कर्ष
बिहार की पारंपरिक चित्रकला – मधुबनी और मंजूषा – सिर्फ कलाकृति नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ये न केवल बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करती हैं, बल्कि पूरे भारत और विश्व को यह संदेश देती हैं कि लोककला ही लोकजीवन की आत्मा है।
आज आवश्यकता है कि हम इन कलाओं को सिर्फ दीवारों तक न सीमित रखें, बल्कि इन्हें स्कूलों, संग्रहालयों, फैशन, डिज़ाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुँचाएं, ताकि नई पीढ़ी अपने संस्कृतिक मूल्यों को जान सके और इन पारंपरिक कलाओं का भविष्य और भी उज्जवल हो सके।
संदर्भ सूची
- दास, जे. पी. (1992). मधुबनी पेंटिंग. अभिनव प्रकाशन.
- रॉय, एम. (2010). मिथिला पेंटिंग: द एवोल्यूशन ऑफ़ एन आर्ट फॉर्म. न्यू एज इंटरनेशनल.
- सिंह, आर. (2015). मंजूषा आर्ट ऑफ़ बिहार: ए स्टडी. बिहार हेरिटेज सोसाइटी.
- भारतीय लोक कला मंच. (2018). लोक कलाओं का राष्ट्रीय अभिलेखागार. वॉल्यूम IV.
- कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार. (2021). पारंपरिक चित्रकला: मधुबनी एवं मंजूषा. राज्य प्रकाशन.
- नेशनल क्राफ्ट म्यूज़ियम. (2019). हस्तशिल्प विरासत रिपोर्ट. नई दिल्ली.
- भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री. (2007). मधुबनी पेंटिंग के लिए जीआई टैग प्रमाणपत्र.
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