नाग पंचमी: बिहार की सांस्कृतिक धरोहर
नाग पंचमी: बिहार की सांस्कृतिक धरोहर
बिहार की मिट्टी में रचे-बसे नाग पंचमी पर्व की परंपराएँ भारत के अन्य क्षेत्रों से एकदम भिन्न हैं। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाए जाने वाले इस पर्व में बिहार की लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और पर्यावरण चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। मिथिला, मगध और भोजपुर क्षेत्रों में नाग पूजा के विविध रूप प्रचलित हैं, जो इस पर्व को बिहार की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बनाते हैं।
बिहार में नाग पंचमी का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
बिहार में नागों को केवल देवता नहीं, बल्कि ग्राम देवता और कुल देवता के रूप में पूजा जाता है। प्राचीन काल से ही बिहार के गाँवों में 'नागवंशी' समुदाय की मान्यता रही है जो नागों को अपना पूर्वज मानते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि बिहार के नालंदा और राजगीर क्षेत्र में नाग पूजा की परंपरा बौद्ध काल से ही प्रचलित थी।
बिहार की लोक मान्यता के अनुसार, नाग देवता कृषि के संरक्षक हैं। वे खेतों में चूहों और हानिकारक कीटों को नियंत्रित कर फसलों की रक्षा करते हैं। इसीलिए नाग पंचमी के दिन किसान अपने खेतों में नाग देवता को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में नाग पंचमी की विशिष्ट परंपराएँ
िथिला क्षेत्र की कला
मधुबनी और दरभंगा में महिलाएँ मधुबनी पेंटिंग शैली में दीवारों पर नाग देवता के चित्र बनाती हैं। इन चित्रों में स्थानीय कलाकार नाग-नागिन के प्रतीकात्मक रूपों को गोबर और प्राकृतिक रंगों से उकेरती हैं।
भोजपुर का अनुष्ठान
भोजपुर क्षेत्र में 'नाग डोल' की अनूठी परंपरा है, जहाँ नाग देवता की प्रतिमा को सजावटी डोली में बैठाकर गाँव के चौक पर लाया जाता है और सामूहिक पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से 'ठेकुआ' नामक मिठाई बनाई जाती है।
मगध की कथा परंपरा
गया और नवादा जिलों में नाग पंचमी की रात 'नाग गाथा' सुनने की परंपरा है। बुजुर्ग पंडित जी नागों की पौराणिक कथाओं और स्थानीय लोक कथाओं का वाचन करते हैं, जिसे पूरा गाँव एकत्रित होकर सुनता है।
कृषि संबंधी निषेध
सम्पूर्ण बिहार में इस दिन हल चलाना या खुदाई करना वर्जित माना जाता है। किसान इस दिन अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं और नाग देवता से अच्छी फसल की कामना करते हैं
पटना के आसपास के क्षेत्रों में एक अनूठी परंपरा 'नाग गीत' की है। ग्रामीण महिलाएँ समूह में नाग देवता की स्तुति में लोक गीत गाती हैं जिन्हें 'नाग गीत' कहा जाता है। यह गीत बिहार की लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं।
मन्नपुर नाग मंदिर, भागलपुर
यह बिहार का सबसे प्राचीन नाग मंदिर माना जाता है जहाँ स्वयंभू नाग देवता विराजमान हैं। मान्यता है कि यहाँ पूजा करने से सर्पदंष का भय समाप्त हो जाता है।
बसंतपुर नाग कुआँ, मधुबन
मधुबनी जिले के इस पवित्र कुएँ में सैकड़ों नाग देवता निवास करते हैं। नाग पंचमी के दिन यहाँ दूध और फूल चढ़ाने की अनूठी परंपरा है।
ककोलत नाग मंदिर, बांक
इस मंदिर में पत्थर से निर्मित विशाल नाग प्रतिमा है जिसके दर्शन मात्र से मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता है। यहाँ नाग पंचमी पर तीन दिवसीय मेला लगता है।
बिहार की लोक मान्यताएँ एवं विश्वास
- बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन सपने में सर्प दिखाई देना आने वाले सुख और समृद्धि का संकेत होता है
- मिथिला क्षेत्र में नवविवाहिताएँ नाग पंचमी पर विशेष पूजा कर संतान प्राप्ति की कामना करती हैं
- भोजपुर में नाग पंचमी के दिन घर के आँगन में गेहूँ के आटे से नाग बनाकर पूजा करने की परंपरा है
- बिहार के कई क्षेत्रों में इस दिन 'नाग पंचमी व्रत' रखा जाता है जिसमें सूर्यास्त तक उपवास रखकर नाग देवता की कथा सुनी जाती है
पर्यावरण संरक्षण और बिहार की नाग पंचमी
बिहार की नाग पंचमी परंपरा प्रकृति संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश देती है। स्थानीय मान्यताओं के कारण बिहार के ग्रामीण सर्पों को मारते नहीं हैं, जिससे सर्प प्रजातियों का संरक्षण होता है। ये सर्प खेतों में चूहों और हानिकारक कीटों को नियंत्रित कर किसानों की मदद करते हैं।
बिहार सरकार ने नाग पंचमी के अवसर पर 'सर्प संरक्षण जागरूकता अभियान' शुरू किया है जिसमें लोगों को सर्पों के महत्व और उनके संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाता है। इस पर्व के माध्यम से जैव विविधता के प्रति सम्मान का भाव विकसित होता है।
संदर्भ सूची
- डॉ. रामप्रवेश राय, बिहार की लोक संस्कृति और पर्व (2018)
- लेखक: प्रो. उषा किरण, मिथिला शोध संस्थान, दरभंग मिथिला के धार्मिक पर्व एवं उत्सव
- बिहार पर्यटन विभाग
- भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद
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